धर्म रक्षक, जाट पुत्र महाराजा सूरजमल - एक कविता

क्या करूं बखान
   लोहागढ़ के महाराजा सूरजमल तेरी शान का...... 

खूब परचम लहराया है 
    आगरा, कानपुर, अलीगढ़, पानीपत और दिल्ली तक तेरे          स्वाभिमान का..... 

धर्म की रक्षा खातिर तूने
   तोड़ दिया दरवाजा लाल किले और मुगलों के अभिमान का.

दिखा दिया अपनी ताकत का ट्रेलर
    महज था तब तू 18 साल का......... 

थी जयपुर के रण में 7 राज्यों की सेनाएँ
   फिर भी छीन लाया ईश्वरीसिंह के लिए ताज अपने गुमान का

न छोड़े मराठे, न छोड़े मुगल
   छीन लाया वैभव उजड़ते सोमनाथ का........ 

अटल और अजब साहसी था
    दुश्मन सैना पर भारी था बस ऐलान तेरे नाम का....... 

सीखा था तूने एक पाठ बकरी से
     बच्चों को बचाने के लिए शेर से भिड़ जाने का.....

था तू सच्चा वीर पराक्रमी
     जनता का था परम हितैषी, नहीं था सिर्फ नाम का...... 

नहीं उठी कोई बिकने वाली कलम कभी
     इतना डर है इतिहास के पन्नों पर तेरे नाम का.....

अपने शोर्य और पराक्रम से 
    कर दिया तूने ये साबित था तू बेटा जाट का...... 
 
नमन है तुझे मेरा बारम्बार, 
     हे हिन्दू धर्म रक्षक, जाटणी के लाल  शोर रहेगा अमर              हमेशा तेरे नाम का....... 

करते हैं तुझसे ये वादा सुरजमल
      सम्मान करेगा यह हिन्दू धर्म युगों युगों तक तेरे बलिदान           का......... 

 हिन्दू हृदय सम्राट महाराजा सूरजमल जाट की
313 वीं जयंती पर कोटि कोटि नमन 🙏🙏🙏🙏

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